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प्रेरक कथा: समय का मूल्य


प्रेरक कथा बेंजामिन फ्रें​कलिन से सम्बन्धित है. जो हमें समय का मोल समझाएगा. उस समय बेंजामिन के पास एक किताबों की दुकान थी, जो अपने सही मूल्य के लिए जानी जाती थी. उनकी दुकान में बड़ी भीड़ रहती थी. एक बार एक ग्राहक आया और एक किताब में काम करने वाले लड़के से एक खास किताब मांगी. लड़के ने ग्राहक को किताब दी और बोला इसका मोल एक डालर है. ग्राहक को किताब कुछ महंगी लगी.

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उसने एक दूसरे नौकर से उस पुस्तक का मूल्य जानना चाहा. दूसरे नौकर ने भी किताब को अलट—पलट कर देखा और उसका मूल्य एक डॉलर ही बताया. ग्राहक को उसकी बात पर भी विश्वास नहीं हुआ. उसे अभी भी लग रहा था कि पुस्तक का मूल्य जरूरत से ज्यादा है. उसने नौकर से अनुरोध किया कि उसे दुकान के मालिक से मिलना है ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके कि इस पुस्तक का मूल्य एक डॉलर ही होना चाहिए.

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उसने कहा की आप कृपया दूकान के मालिक को बुलवा लें. मालिक थे- सर बेंजामिन फ्रेंकलिन, जो उसी दूकान के ऊपर स्थित अपने प्रिटिंग प्रेस में बैठे हुए किसी पुस्तक का प्रूफ देख रहे थे. नौकर के पुकारने पर वे अपने हाथ का काम छोड़कर नीचे चले आये. ग्राहक के पूछने पर उन्होंने उसी पुस्तक का मूल्य सवा डालर बताया. ग्राहक ने कहा कि आपके नौकर ने तो एक ही डालर मूल्य बताया और आप उससे भी अधिक बता रहे हैं - ऐसा क्यों?

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फ्रेंकलिन ने कहा- ‘अब तो इसका मूल्य डेढ़ डालर हो गया है, क्योंकि मैं काम को छोड़कर यहां आने का जो समय दे रहा हूं, उसका मूल्य भी इसमें शामिल हो गया है।‘ 
ग्राहक को अपनी गलती समझ में आ गई. ग्राहक ने डेढ़ डालर देकर पुस्तक ले ली। कहा है- 
‘समय चूकि पुनि का पछिताने‘. इस कहानी से हमें बेंजामिन फ्रेंकलीन ने यह समझाने की कोशिश की है कि सिर्फ अपना ही नहीं दूसरों का समय भी महत्वपूर्ण होता है और हमें दूसरों का समय जाया करने से बचना चाहिए.

Moral of The Story कहानी से शिक्षा: समय अमूल्य है, चाहे अपना हो या फिर दूसरों का.

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