Hitopadesha Stories Hindi-lobh Buri bala hai |
नैतिक कहानियां— हितोपदेश की कहानियां
लोभ बुरी बला है
चित्रग्रीव ने कथा सुनाई.
साथियों एक दिन मैं दक्षिण के वनों मे भ्रमण कर रहा था. वहां मैंने एक तालाब के किनारे बूढ़े बाघ को बैठे देखा. कहने को तो वह बाघ था, पर उसने हाथ में कुशाएं ले रखी थी, दूसरे हाथ में सोने का कंगन. उसकी तापसी मुद्रा देखकर मुझे हंसी आ गई. पर दूसरे ही क्षण मैं गंभीर हो गया. मैं सोचने लगा कि यह बाघ आज अवश्य कोई प्रपंच के लिए बैठा है.
उस सरोवर के पास ही एक रास्ता था. आने जाने वालों को यहां से गुजरना पड़ता था. बाघ आने जाने वालो से कह रहा था कि आज मैं कुछ दान करना चाहता हूं. मेरे पास सोने का कंगन है, जो चाहे इसे ले सकता है. लोग उसकी ओर देखते और उसकी धूर्तता को समझ जाते और अपनी राह लेते.
सभी लोग एक जैसे नहीं होत हैं. वहां से गुजरने वाला एक पथिक लोभी था. बाघ ने उसे भी सोने का कंगन देने के लिए बुलाया. पथिक सोचने लगा कि उसका आधा जीवन बीत गया लेकिन अपनी पत्नी के लिए इतना सुंदर कंगन नहीं बना पाया. अगर यह कंगन मुझे मिल जाए तो मेरा शेष जीवन बहुत सुख से बीत सकता है. फिर उसने सोचा कि बाघ के नजदीक जाने पर हो सकता है कि वह मेरे प्राण ही ले ले. बाघ ने उसे फिर से कंगन देने के लिए अपने पास बुलाया. लालच ने उस पथिक की बुद्धि हर ली. पथिक ने बाघ से पूछा कि तुम्हा कंगन कहां है और उसे लेने के लिए क्या करना होगा.
बाघ ने कहा कि हे पथिक मैंने युवावस्था में बहुत से पाप किए हैं और बहुत से जानवरों तथा मुनष्यों की हत्या की है. इन पापों की वजह से मेरी पत्नी और बच्चो की मृत्यु हो गई. मेरे सारे दांत और नाखून झड़ गए. इन कष्टों को दूर करने के लिए एक महात्मा ने मुझे दान करने का सुझाव दिया है. तुम स्वयं ही सोचो की एक बूढ़ा बाघ जिसके पास दांत और नाखून नहीं है वह भला तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है.
इस कंगन को लेने के लिए तुम्हे इस तालाब से एक कमल का फूल लाकर मुझे देना होगा और बदले में तुम यह कंगन ले जा सकते हो. पथिक को बाघ की बातें ठीक मालूम हुई. वह कमल लाने तालाब में उतरा तो कीचड़ में धंस गया और निकल नहीं पाया. बाघ ने कहा कि लगता है तुम्हें मेरी सहायता की जरूरत है और ऐसा कहकर वह पथिक के पास गया और उसको खा गया. पथिक को अपने लोभ की वजह से प्राण गंवाने पड़े.
चित्रग्रीव ने कहा कि जिस तरह बाघ का साधु बन जाना विचित्र बात है, ठीक उसी तरह इस जंगल में चावल के दानों का होना भी विचित्र बात है. इसलिए हमें इन दानों का लोभ नहीं करना चाहिए और आगे प्रस्थान करना चाहिए. कबूतरों ने कथा सुनने के बाद भी चित्रग्रीव को कहा कि बहुत लंबी उड़ान की वजह से वे थक गए हैं और उनको भूख भी लगी है. इन चावल के दानों को छोड़कर आगे बढ़ जाना मूर्खता होगी.
चित्रग्रीव ने कहा कि अगर आप साथियों का बहुमत से यही फैसला है कि हमें इन दानों का सेवन करना चाहिए तो मैं भी आपके साथ चलूंगा क्योंकि मित्रों को विपत्ति में छोड़ने से बड़ा पापकर्म कोई नहीं है. ऐसा कहकर सब कबूतर चित्रग्रीव के साथ उन चावल के दानों को खाने के लिए जाल में उतर गए. कबूतरों ने दाने खाने के बाद जब उड़ने का प्रयास किया तो उन्होंने पाया कि वे तो जाल में फंस चुके हैं. उन्होंने चित्रग्रीव की बुद्धिमता की प्रशंसा की और उससे आग्रह किया कि वह उन्हें इस संकट से निकाले.
चित्रग्रीव ने कहा कि संकट कभी घबराने से दूर नहीं होता है. हमें आलस्य का त्याग करना चाहिए और छोटी—छोटी वस्तुओं के संगठन से भी कार्य सिद्ध हो जाते हैं. इस नीति पर चलते हुए हमें एक साथ जाल लेकर उड़ चलना चाहिए.
चित्रग्रीव की बात को सुनते ही सभी कबूतरों ने एक साथ पंख फड़फड़ाने शुरू कर दिए और कबूतर जाल लेकर उड़ गए. शिकारी कबूतरों को पकड़ने के लिए भागा लेकिन उन्हें पकड़ नहीं पाया.
कबूतरो ने एक बार फिर चित्रग्रीव से पूछा कि स्वामी अब हमें क्या करना चाहिए तो चित्रग्रीव ने कहा कि विपत्ति में माता, पिता और मित्र ही सहायक होते हैं. शेष तो अपनी कार्यसिद्धि के लिए ही हित करते है. मेरा परम मित्र हिरण्य चूहा हमारी मदद कर सकता है.
आओ मित्रों हम हिरण्यक के पास चले. वह अपने तेज दांतो से इस जाल को काट डालेगा. सब कबूतर हिरण्यक के पास पहुंचे. हिरण्यक आया तो उसने देखा कि इतने सारे कबूतर है तो उसने चित्रग्रीव से कहा कि मित्र इतने सारे जाल को काटने में तो बहुत समय लग जाएगा. मैं ऐसा करता हूं कि तुम्हारा जाल काट देता हूं और फिर हम और चूहों को बुला लाएंगे और शेष जाल भी काट डालेंगे.
चित्रग्रीव ने कहा कि नहीं मित्र यह अन्याय है. अपने आश्रितों की चिंता न करके अपना उद्धार पहले करना स्वार्थ है. तुम बारी—बारी से सबके बंधन काट डालो और जब मेरी बारी आए तो मेरे बंधन काट देना.
हिरण्यक बोला मित्र मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था. तुम चिन्ता न करों जब तक मेरे दांत नहीं टूटते मैं बंधन काटता ही रहूंगा. हिरण्यक ने सब कबूतरों के बंधन काट दिए.
लघुपतनक कौआ जो इस पूरी घटना को देख रहा था. कबूतर और चूहे की मित्रता से बहुत ही प्रभावित हुआ. वह भी हिरण्यक के बिल के पास गया और बोला कि मित्र हिरण्यक तुम धन्य हो. तुम्हारे जैसे मित्र संसार में ढूंढते से भी नहीं मिलते हैं. मैं चाहता हूं कि तुम मुझे भी अपना मित्र बना लो.
तुम कौन हो जो मेरा मित्र बनना चाहते हो? हिरण्यक बिल के अंदर से ही बोला.
मैं लघुपतनक नाम का कौवा हूं.
चूहे और कौए कि मित्रता कैसे हो सकती है? मैं तुम्हारा भोजन हूं और तुम मेरे शत्रु. आग और पानी में कभी मित्रता हो सकती है. मुझे नहीं करनी ऐसी मित्रता. कहीं मेरा भी हाल वही न हो जाए तो हिरण और गीदड़ का हुआ था. हिरण्यक ने कहा वह कैसे? मैं भी सुनना चाहता हूं मित्र। मुझे भी हिरण और गीदड़ की कहानी सुनाओं. लघुपतनक ने प्रार्थना की.
हिरण्यक ने कथा सुनाई.
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अगली कथा- करनी का फल.
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